प्राणी जगत को सब ओर से आवरण देने वाली प्रकृति के अंग पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु आदि पर्यावरण कहे जाते है –
परितः आवृणोति
श्रीमदभागवत् गीता में प्रकृति के उपरोक्त पाँच महाभूत के अतिरिक्त मन, बुद्धि एवं अहंकार रूप अंतःकरण त्रितय माने गये है । भूमिरापोनलो वायुः खं मनो वृद्धिरेवच ।
अहंकारं इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्ट..
यजुर्वेद में धौ,अंतरिक्ष, पृथ्वी ,जल,औषधि,वनस्पति ,
विश्वेदेव, और ब्रह्मा को पर्यावरण का अंग माना गया है तथा इनके शुभ होने की कामना की गयी है — ओम धौ शान्तिरन्तरिक्ष शान्ति……। प्रदूषित पर्यावरण की भयावह विभिषिका से सूरक्षा हेतु वेदों में यज्ञ क्रिया का उपदेश दिया गया है । यज्ञ के पाँचों अंगों- समिधा,गोघृत,पात्र,मंत्र,भावना । समिधा के रूप में गाय के गोबर में —-
मेन्थाल,
अमोनिया,
फिनाल,
इन्डाल,
नाईट्रोजन,
फास्फोरस अम्ल,
पोटास का अंश पाया जाता है । गोधृत से हवन करके वायु प्रदूषण को दूर किया जा सकता है । अथर्वेद-13/1/28 पिरामिड के आधार का हवन पात्र विधुत्त चुम्वकीय शक्तियों वाला होता है। अमेरिकीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान नासा में पिरामिड ऊर्जा को ऊर्जा से अधिक क्रांतिकारी माना है । ध्वनि प्रदूषण के लिए वेद में मौन का आदेश दिया गया है- — उन्मादिता मौन येन वार्ता आ तस्थिमा वयम्-ऋग्वेद (10/136/3 )
पर्यावरण के उपद्रवों में वायु तत्व, उसके सहायक रूप में अंतरिक्षस्य विधुत तत्व, सौर् मंडलीय प्रभाव का वर्णन विस्तृत रूप से यजुर्वेद में पाया जाता है वैदिक विज्ञान के अनुसार 49 तरह के मरुदगण में सात प्रकार के भंयकर, विनाशक कृत्योदपादक वात में — उग्र (प्रचंड तेज गति वाला), भीम (अत्यन्त भयानक) ध्यांत (शब्द करने वाला ) धुनि(अत्यंत कम्पायमान) विक्षिप ( पदार्थ को एक स्थान से दूर स्थान में फेकने वाला) अभियुग्वा (टक्कर मारने वाला) सासहवान (तोङ-फोङ करने वाला)का वर्णन है तथा उसके विनाशक शक्ति को नष्ट करने हेतु यज्ञ में स्वाहाकार पूर्वक आहुतियां प्रदान करने से इनकी प्रतिकूलता तथा विजयता नष्ट होती है —
(यज्ञ महाविज्ञान पृ०-135) यज्ञ के हविद्रव्यों मैं गोघृत प्रधान है इसे आज्य कहा गया है । यह प्रदूषण रूपी विष का प्रतिरोधक एवं इसमें पर्तयावरण शोध शक्ति अतुल मात्रा में होता है ।
यज्ञ में घी प्रधान हव्यद्रव चावलों में मिश्रित करके मंत्रोच्चारण पूर्वक अग्नि में आहुति दी जाती है,तब इस आहुति के जलने से उत्पन्न चार गैसे अभी तक पहचानी जा चुकि है—
(क) एथिलीन आक्साईड
(ख) प्रापिलीन आक्साईड
(ग) फार्मलडिहाइड तथा
(घ) बीटा प्रापियो लेक्टोन आहुति के बाद गोधृत से एसिटिलीन गैस उत्पन्न होता है जो प्रखर उष्णता की ऊर्जा है जो प्रदूषित वायु को अपनी ओर खींचकर उसे शुद्ध करती है ।
अधुना भौतिकवादी युग में प्रदूषण से निजात पाना आसान कार्य नहीं है । फलतः यज्ञ महाविज्ञान पृष्ट-38-40 के अंतर्गत विशेष प्रक्रिया का विधान दर्शाया गया है जो प्रदूषित स्थानों यथा प्रदूषण उत्पत्ति के स्थानों में प्रति एक वर्ग किलोमीटर या प्रतिफैक्टरी या जहाँ कल कारखाने नहीं है,वहाँ प्रति ग्राम में एवं प्रति एक वर्ग किलोमीटर के कृषिक्षेत्र के मध्य 2×3 मीटर का स्थान नियत कर60×60 से.मी. लंम्बा चौरा गहरा कुण्ड जो चतुर्थांशरूप में 15 से.मी.
लम्बा चौङा सम चौरस चतुष्कोण हो । इस यज्ञ में आम
,पलाश,
बिल्व,
चंदन,
पीपल,
खादिर,
विकडकत,
आक,
शमी,
देवदारू,
युकेलिप्टस एवं अन्य सुगंधीत वृक्षों के 25 से.मी.मोटी 24 टूकङे हो जिनमें—-
6 समीधा 18 से.मी.
6 समीधा 25 से.मी.
6 समीधा 37.5 से.मी
.6समीधा 45 सेमी.
हव्य द्रव्य मोटे कूटे 400 gm
गो घृत 150 ग्रा० को मिला कर उसे 16 भाग करके एक-एक मीनट के अंतराल पर गायत्री ,विश्वानि देव 24 और मृंत्युजय मंत्रों को पढते हुए स्वाहा के साथ डालनी चाहिए ।
समय सीमा–30 मीनट ।
प्रभावित क्षेत्र-एक किलोमीटर ।
इस प्रकार यह प्रयोग कारखानों, मिलों में कार्य करने वाले एवं प्रदूषण से पीङित व्यक्तियों में शारीरिक कार्य क्षमता तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि, रेबियम धर्मिता, अनुशक्तिजनित कुप्रभावों से रक्षण में सहायक होगा। बौद्धिक एवं मानसिक शक्ति संवर्द्धन होने से जनजीवन अपराध प्रवृति रहित बनेगा और राष्ट्रीय स्तर पर युद्व का उन्माद भी घटेगा । ऊँ इति शुभ । माता भूमिः पुत्रों अहमं पृथिव्याः।
