कविता

जय बोलो श्रीराम की

धुंध से सुनहरे प्रकाश की ओर जाते धनुषधारी श्रीराम का कल्पनात्मक चित्र।
जय बोलो श्रीराम की से प्रेरित एआई चित्रांकन।
पाठ का आकार

जयकारा एकबार लगाओ,
जय बोलो सियाराम की ।
घने कोहरे छट जायेगा,
है पुण्य धरा श्री राम की ।

माटी का तेरा मेरा काया,
माटी का व्यापार है।
खिंच रहा छकङा शिव वाहन,
फिर डरना बेकार है ।

कालचक्र सुख-दुख का पहिया,
दौङ रहा अविराम है ।
दूर गगन से निरख रहा ,
सुर्यवंशी दिनमान है ।

है मंजिल कहाँ कहाँ रूकना है ।
पूर्व सुनिश्चित भाल है।
डर डर कर जीना फिर कैसा,
निर्वल के बल राम है ।

डॉ. नीलिमा वर्मा “निशिता”

कवयित्री, लेखिका एवं संस्कृत विदुषी