नारत्वं दुर्लभं लोके विधा तत्र सुदुर्लभा,
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा।।
(साहित्य दर्पण)
"सच ही मनुष्य योनि में जन्म लेना दुर्लभ है उससे भी अधिक दुर्लभ है कवि होना तथा इन तीनों के साथ शक्ति संपन्न होना तो अत्यन्त दुर्लभ है ।" इस उक्ति के संदर्भगत जब हम सरिता सिंह "स्नेहा"के कृतित्व और व्यक्तित्व पर दृष्टिपात करते है तो पाते है कि सरिता सिंह जी एक सहृदय मानुषी होने के साथ विद्या-वैभव सम्पन्न तो है ही एक सुविख्यात विदुषी भी है । चारों सुयोगों -संबलित इनकी सार्धम्य रचनाशीलता का दोहा प्रवाह सुस्ठु प्रमाण है । इस दोहा प्रवाह रचना विधान का अपना एक अलग तेजस एवं अर्थ गाम्भीर्य है । इसमे शब्द-शब्द का सुविचारित व्यवहार महाभाष्य की इस उक्ति को चरितार्थ कर रहा है- एकः शब्दः सम्यक् ज्ञातः,
सुष्ढु प्रयुक्तः स्वर्गलोके च कामदुग्भाविता ।
(पतंजलि महाभाष्य)
स्नेहा जी ने अपनी भाव-संपदा को व्यक्त करने हेतु शब्दों का चयन बङे ही मनोयोग एवं यत्नपूर्वक की हैं ,फलतः ध्वन्यात्मक – अर्थवलय -संपृक्त प्रयोग कथ्य, भावुक अभिव्यंजना ध्वनित हो बिम्बों की व्याहृति के साथ अनुकूलता व्यंजित कर रही है जो इनके कवित्व – शक्ति का बोधोत्सव स्वरूप है । दोहा प्रवाह दोहा संदर्भो का वास्तविक वास्तविकता का दर्पण है , सम्यक् समाहार है और सरिता सिंह स्नेहा का प्राण्जल प्रतिभा का प्रमाण भी ।
जिसमें घर से लेकर बाहर की फैली दुनियांँ है । उसी दुनियाँ में निरंतर यात्राओं के बीच आनंदित होती हुई सरिता सिंह"स्नेहा" की आस्था और संस्कृति है । आस्था प्रकृति के प्रति है तो संस्कृति परिवेश और विरासत के लिए प्रेरित करती है । प्रस्तुत दोहा-प्रवाह छांदसिक अनुशासन प्रवाह में वैचारिक संजाल को प्रस्तुत करती है । जो स्त्री मन और शक्ति भाव देखने योग्य तथा प्रशंसनीय है । भारतीय स्त्री की आस्था धार्मिक और आध्यात्मिक होती है । यह उसे विरासत में मिलती है । सरिता सिंह "स्नेहा" की दोहों में अलग- अलग इन्हीं भावों का उद्दात चित्रण है –
करें नमन वागेश्वरी, दे ज्योतिर्मय ज्ञान,
सत्य भाव हृदय भरे,ऐसा दे वरदान । कवयित्री अभिव्यक्ति में भाव को प्रधान मानती है। भाषा और शिल्प इनके लिए भाव को प्रस्तुत करने के संसाधन है । यह जीवन को जटिल नहीं मानती है । जीवन इनके लिए ईश्वर का दिया हुआ अनमोल वरदान है- इसलिए जीवन को पूरी जिन्दादिली से जीना चाहिए,ईश्वर पर श्रद्धा और विश्वास है, भरोसा है कि जिसने जीवन दिया है अच्छा करने का दायित्व भी उसी का हैँ-
ईश्वर सबका एक है सुने सबकी गुहार,
मानव हो मानव रहो,रखो सम व्यवहार ।
इनकी दोहो में कहीं कौई वाद नहीं , सब कुछ खुला- खुला और बेलोसपन की मस्ती में है । काव्य में भाव पक्ष और कला पक्ष का नित्य सम्बंध होता है । भाव पक्ष काव्य की आत्मा तथा कला पक्ष काव्य का शरीर होता है । सरिता सिंह स्नेहा द्वारा रचित काव्य दोहा प्रवाह में भावों की अबाध निर्झरिणी प्रवाहित हुई है। माँ शारदे की भावपूर्ण वंदना से होती हुई प्रकृति ,जीवन की सार्थकता,राष्ट्र,पशु पक्षी, समाज से होती हुई गाँव की पगडंडियों तक निर्बाध रूप से बही है । जो कवयित्री के मनोभावों की स्पष्ट झांकी प्रस्तुत करती है । इस संग्रह की भाषा सरल,सहज साहित्यिक एवं बोधगम्य है और है भारतीय मन का मंगल भाव है जो सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया का चिंतन करता है-
मानव मानव ही रहे,बँटे ना जाति धर्म ।
रहे उपकार भावना, मानवता का मर्म।।
कवयित्री की भक्ति किसी रूप की असक्ति नहीं है ,बल्कि यह उसकी शक्ति है जिसे वह उस माध्यम से अर्जित करके जग और मनुष्य के लिए मंगलमय करने का सोचती है-
आओ मिल जुल करें ,हम सब बात विचार ।
व्यथा सब की एक है,किस विधि हो उपचार ।
सरिता सिंह"स्नेहा" के व्यक्तित्व और कृतित्व में साम्य है। दोनों को विलग करके नहीं समझा जा सकता है । कविताएं उनके अंतर की बाहरी कलेवर है । दोहों में उनका मन प्रतिबिंवित होता है । आशा की ज्योति प्रज्जवलित करने वाली कवयित्रि सरिता सिंह"स्नेहा" का सृजनात्मक मंगल अभियान साहित्य के विभिन्न विधाओ के माध्यम से सदा आलोक पूर्ण बना रहे , चिन्तन का चतुर्दिक चन्दोवा संजोए इस सुधर दोहा प्रवाह हेतु अभिनंदन ! शुभकानाओ के साथ शब्दकर्म का स्वागत है । यशोवर्धताम्!शुभमस्तु चिरायुरस्तु ।
कविर्मनिषी परिभू स्वयम्
(यजुर्वेद)
डाँ०नीलिमा वर्मा"निशिता"
व्याख्याता सह विभागाध्यक्षा(संस्कृत)
