मिथिला की मिट्टी का विलक्षण विभूति, राजनीति के गगनाङ्गण का देदीप्यमान नक्षत्र,गंभीर चिंतक,प्रख्यात शिक्षाविद्, सुधी विचारक, समाजसेवी, लेखक, प्राध्यापक, काँग्रेस का गद्दावर नेता, अपने अग्रज भाई ललित नारायण मिश्र जी से राजनीति का ककहरा – पटु स्व. डा०जगन्नाथ मिश्र जी का जन्म बिहार के सुपौल जिला के अंतर्गत बसाउनपट्टी गाँव के प्रख्यात समाज सेवी , स्वतंत्रता सेनानी पंडित रविनंदन जी के यहाँ 24 जून 1937 को हुआ । आपके बहुआयामी व्यक्तित्व एवं सम्पूर्ण जीवन यात्रा में कोटिशः अनुकरणीय पङाव देखने को मिलता है जो एक सुदृढ समाज, एक सशक्त शैक्षणिक माहौल, कुशल राजनीति एवं विशुद्ध मानव मूल्यों को स्थापित करता है । 2015 में आप द्वारा लिखी गई पुस्तक "बिहार बढ कर रहेगा" जिसका लोकार्पण बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री. सुशील कुमार मोदी जी द्वारा कराया गया । यह पुस्तक अपने आप में एक मिल का पत्थर है । जिसमें आपका बिहार राज्य के प्रति प्रेम, गौरव दृढसंकल्पित भाव दर्शनीय है ।
2017 में आपने माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से मुलाकात कर अपनी पुस्तक मधुबनी – द – आर्ट कैपिटल सप्रेम भेट किया । जो मधुबनी पेंटिंग्स एवं बिहार प्रांत का गौरव दिग्दर्शन है । इसमें मिथलांचल क्षेत्र की सभ्यता, संस्कृति, वास्तुकला,चित्रकला और ऐतिहासिक, धार्मिक पर्यटन स्थलों के बारे मे एक सहज सुलभ जानकारी दुनियाँ के सामने लायी गयी हैः। इस तरह आपने अन्य और पुस्तकों का लेखन और,संपादन भी किया । एक अर्थशास्त्री होने के नाते बिहार की अर्थव्यवस्था पर आपने कई किताबें लिखी है, जो अर्थशास्त्र पढने वाले सुधी छात्रों के लिए कुशल मार्गदर्शक के रूप में विद्यमान है ।
भाषा के विकास के क्षेत्र में भी आपका कार्य एवं प्रयास सराहनीय रहा है । मैथिली सहित विभिन्न भाषा अकादमियों की स्थापना किया गया । भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी आपके विचारों से सहमत होकर एवं मैथिली भाषा की अकादमिक एवं श्रेष्ठ साहित्य संपदा से प्रभावित होकर मैथिली को अष्टम अनुसूची में सम्मिलित किया । जो बिहार एवं मिथिला भाषी के लिए स्वर्ग द्वार बना। आपके कठीन परिश्रम एवं योगदान का प्रतीक बिहार की प्रसिद्ध सांस्कृति संस्था चेतना समिति भवन अमूल्य धरोहर के रूप में आज भी अवस्थित है ।
आप जाति -वर्ग विहीन एवं सद्भावना पूर्ण समाज के पक्षधर थे तभी तो आपने श्रमसाध्य काम करते हुए मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान तथा बिहार आर्थिक अध्ययन संस्थान की स्थापना किया तथा उसके माध्यम से समाज के उपेक्षित वर्ग के दुख-दर्द के मूल कारण को समझने की चेष्टा की । आप अपने जन्म दिन पर विषेश रूप से बिहार आर्थिक अध्ययन संस्थान अथवा मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के तहत सामाजिक आर्थिक उन्नति विषयक संगोष्ठी का आयोजन करते थे ।
शिक्षा के क्षेत्र में आपका योगदान अपूर्व था ।आप विकास को शिक्षा से जोङकर देखते थे । आपका कहना था कि शिक्षा जितनी गुणवत्तापूर्ण होगी विकास उतना ही उन्नत हो सुदृढ एवं समाज के निम्न वर्ग तक पहुचेगा । एक शिक्षक को समाज में प्रयाप्त सम्मान मिलना चाहिए । क्योंकि शिक्षक को बिना प्रयाप्त सुविधा दिये बिना शिक्षा का समुचित विकास सम्भव नहीं हो सकता । अपनी इसी धारणा के फलस्वरूप बिहार विश्वविद्यालय शिक्षकों के लिए यू.जी.सी. वेतनमान लागू किया ,सरकारी कर्मचारियों को भी आपने केन्द्रीय वेतनमान दिया । आरा,छपरा ,हजारीबाग में नये विश्वविद्यालय की स्थापना की । विभिन्न कालेजों के अंगिभूत करने के पिछे आपका यह तर्क था कि यह शिक्षा के क्षेत्र में मेरा पहला स्टेप है इसके बाद का कार्य होगा कालेजों के आधारभूत संरचना से सुदृढ करना साथ ही महाविद्यालय में शिक्षक छात्र की उपस्थिति सुनिश्चित करने पर ध्यान देना ,ताकि हमारे प्रांत के स्नातक देश में कहीँ भी नौकरी पा सके । किन्तु जीवन संघर्ष के थपेड़ों के बीच अपनी शेष इच्छा पूरी नहीं कर सके और अंततः 19अगस्त 2019 को प्रातःकाल आप अपने दिल्ली आवास पर स्थूल शरीर का त्याग कर ब्रह्मलोक में लीन हो गये । आपका सशरीर चेहरा संतुष्टि की आभा से भाषित गीता की निम्न पंक्ति को चरितार्थ करती हुई–
मुहूर्त ज्वलितं श्रेयःन तु धूमायितं चिरम्।
