आलेख

साहित्य शिक्षा और भाषा विमर्श

खुली पुस्तक से उभरती स्याही की शाखाओं, पत्तियों और पक्षियों का कल्पनात्मक चित्र; पास में कलम और दवात।
साहित्य, शिक्षा और भाषा के विचारों से प्रेरित एआई चित्रांकन।
पाठ का आकार

साहित्य एक कला है , कला भावों की अभिव्यक्ति होती है जिसे मूर्त रूप देने के लिए एक साहित्यकार शब्दों का सहारा लेता है ।अतः शब्द कला का का भोग तत्व है । एक साहित्यकार साहित्य साधना में कुछ राजनैतिक,कुछ धार्मिक, कुछ व्यवहारिक,कुछ शिक्षाप्रद एवं कुछ मनोरंजनात्मक पक्ष इसी भोग तत्व के सहारे कलात्मक रूप साहित्य का सर्जन किया करता है । क्योंकि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य होता है तथा साहित्य मनुष्यों द्वारा निर्मित होता है । आज तक कोई भी ऐसा फैक्ट्री नहीं बना है जहाँ मानव का निर्माण होता हो । एक साहित्य ही वह विधा है जो मनुष्य के अन्दर कर्मठता, करूणा, दया,प्रेम, सहानुभूति संवेदना आदि भावों को जागृत कर । मत्वा कर्मणि सीव्यन्ति का उदाहरण प्रस्तुत कर सुसंस्कृत मानव का निर्माण करता है । साहित्य सबके हित की बात करता है हम जो भी इस चराचर जगत में देखते है,सुनते है या महशुस करते है उन सबों के प्रति कल्याण और हित की बात साहित्य ही करता है ।तभी तो कहा गया है कि- हितेन सहितम् सहितम् साहितस्य भावः इति साहित्यम्।

अर्थात साहित्य जीवन का विज्ञान है, यह साहित्य ही जीवन को समृद्ध करती है । अन्य विषयों में हम तर्क पढते है । उसकी तार्किकता पढते है ,विज्ञान के बदौलत हम नित नवीन निर्माण एवं अविष्कार कर रहे है लेकिन उसका सही उपयोग कैसे करना है इसकी जानकारी हमें साहित्य से प्राप्त होता है अतः साहित्य हमे विवेक देता । साहित्य दिल की बात करता है । जिसका सफल उदाहरण प्रेमचंद की कहानी ईदगाह से हम ले सकते है , कहानी इदगाह पढने के पूर्व तथा कहानी पढने के पश्चात दिल में जो भावानुभूति जाग्रत होती है एक तिलमिलाहट जो मन-मष्तिस्क को झकझोरती है जिसे हम स्पष्टरूपेण समझ सकते है कि साहित्य दिल से दिल को जोङने का काम करता है। तभी तो कहा गया है — — – – साहित्य संगीत कला विहीनः।

साक्षात पशुः पुच्छ विषाण हिनः।।

तृणं न खादान्नsपि जीवमानः

तद्भागधेयं परम पशुनाम।।

अर्थात साहित्य मानव मन की पशुता भाव को हटाने के लिए सतत आत्ममूल्यांकन की बात करता है। फलस्वरूप प्रत्येक देश काल का साहित्य वहाँ , उस काल खण्ड के जनता की संचित चितवृतियों का प्रतिबिम्व होता है । जैसे भक्ति काल के साहित्य जब हम पढते है तो हमें उस काल का पुरा समाज,उस काल का पुरा जीवन दर्शन से हम अवगत होते है । चुकि मानव मन की चितवृतियाँ चंचल होती है – मन एव मनुष्याणां बंधनम् कार्य मोक्षयोः के कारण जनता के रहन-सहन, भाव भंंगिमा ,सोचने समझने, उसके रीति रिवाज में सतत परिवर्तन होता रहता है फलतः साहित्य की पृष्ठभूमि ,उसके लेखन की भाषा-शैली शब्द संयोजन आदि में भी पर्याप्त बदलाव होते रहते है। तभी तो कहा गया है साहित्य समाज का दर्पण हैं ,तो दूसरी ओर समाज में व्याप्त अंधविश्वास गलत रीति रिवाज आदि दूर्गुणों के प्रति भी साहित्य समय-समय पर नव निर्माण कर अपनी आवाज उठाती रहती है सही राह दिखाने हेतु साहित्य दीपक का काम करता है अतः साहित्य समाज का दीपक हैँ ।

साहित्य शब्द का एकल प्रयोग सातवीं- -आठवीं सताब्दी से माना जाता है इसके पूर्व तक साहित्य की जितनी विधाएं है- कहानी ,लेख,उपन्यास ,लघुकथा, नाटक,डायरी- लेखन ,संस्मरणआदि वो सारे काव्य के रूप में ही जाने जाते रहे है । भाषा विज्ञान की यह परम्परा रही है कि जब दो या दो से अधिक विषय -वस्तु एक ही अर्थ में प्रयुक्त होता हो तो एक अपना रूढ रूप धारण कर लेता है। अतः काव्य अपने रूढ रूप में जाना जाने लगा ,और साहित्य काअलग रूप स्थापित हुआ ।

शिक्षा– शिक्षा संस्कृत शब्द है व्युत्पत्ति की दृष्टि से शिक्षा- शिक्ष् और शाक्ष् धातु से मिल कर बना है। शिक्ष् का अर्थ होता है सीखना,ज्ञान प्राप्त करना,अध्ययन करना तो वहीँ शाक्ष् का अर्थ होता है-अनुशासन में रखना,नियंत्रन में रखना तथा निर्देश देना है। इस प्रकार शिक्षा द्विमुखी प्रक्रिया है । एक सीखने वाला बालक तथा दूसरा शिक्षित करने वाला शिक्षक ।शिक्षा जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है । एक बालक प्रथमतः अपने माँ से सीखता है फिर परिवार,समाज खेल के मैदान आदि से सीखता है । यह शिक्षा का व्यापक रूप है। विद्यालय, एवं स्कुली शिक्षा जहाँ समय, पाढ्य-पुस्तक ,कक्षा निर्धारण आदि हो वह शिक्षा का सूक्ष्म रूप होता है ।अर्थात शिक्षा व्यापकता से सूक्ष्म की ओर चलने वाली प्रक्रिया है । शिक्षा के इसी सूक्ष्म रूप को त्रिमुखी प्रकिया कहते है । गाँधी जी के अनुसार शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क, शरीर,आत्मा के सर्वांगिक विकास है थ्योरी आँफ टेन फिंगर अर्थात दश अंगुलियों का सिद्धांत ( बेसिक शिक्षा) सफल उदाहरण है ।

भाषा– भाषा भाष् धातु और टाप् प्रत्यय से निस्पन्न ,वाक् अवयवों से उच्चरित स्पष्ट सार्थक एवं अर्थपूर्ण शब्द समूह है । भाषा व्यक्तायां वाचिः वक्ता वाचि वर्णा येषां ते इमे व्यक्त वाचः उच्चरित, गठित, शब्दमयी सर्जना ही वस्तुतः भाषा है । भाषा प्रतीकात्मक,ध्वनिमय एवं क्षेत्रीय सीमाधीन होती है- तभी कहा गया है कोस कोस पर बदले पानी,

चार कोस पर वाणी। एक कोस बराबर 3.12 किलोमीटर पर पानी अपना रूप बदला है तो वहीं बोली चार कोस अर्थात12.48 किलोमीटर पर वाणी (बोली) बदल जाती है ।

भाषा अर्जित परिवर्तनशील – विकासशील- परिनिष्ठित होती है। इसका अपना व्याकरण अपनी लिपि, वैश्विक क्षमता से सम्पन्न होती है । भाषा मानक गुण से सम्पन्न होने के कारण राजनैतिक , सामाजिक, देश की प्रशासनिक कार्यो में प्रयुक्त होती है ।भाषा की ऐतिहासिक सीमा होती है। हिन्दी हमारी राज भाषा है आर्थिक मंच के गणना अनुसार हिन्दी विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओ में एक है । जहाँ तक इसके शब्द भंडारण की बात है तो अभी तक एक सौ दो अरब,अट्ठत्तर करोङ, पच्चास लाख शब्दों का प्रयोग हुआ है और यदि इसी क्रम से नये शब्दों का प्रयोग होता रहे तो मान्यता है कि सौ से दो सौ बर्षों तक इसका शब्द भंडार खाली नहीं होगा । इति।

डॉ. नीलिमा वर्मा “निशिता”

कवयित्री, लेखिका एवं संस्कृत विदुषी