कहानी

बुल्ला की गवाही

बारिश के बुलबुलों के पास पुराने मामले की फाइल पढ़ती महिला पुलिस अधिकारी।
बुल्ला की गवाही से प्रेरित एआई चित्रांकन।
पाठ का आकार

फोन की घंटी घनघनाते ही तपेसर बाबु लपकते हुए फोन उठाकर बोलने लगे हाँ हैलो – आनंदी बेटा ! अरे भोला ड्राइवर गाङी लेकर तुम्हें लेने स्टेशन पहुँचता ही होगा । फोटों में तुम्हें कई बार देख चुका है , तुम्हें देखते ही पहचान भी लेगा , चिन्ता की कोई बात नहीं है । बस तुम आ जाओ । फिर बगल में बैठी अपनी पत्नी से कहने लगे-अपना टाऊन थाना है ना ! वहीं ज्वाइन करने के लिए आ रही है यह नई एस. पी. आनंदी किशोर उसी का फोन है भाई। बात यह है कि यह आनंदी और अपना तनवीर दोनो एक ही यू.पी.एस.सी बैच का पासाउट है और दोनों एक दूसरे से अथाह प्यार भी करते है । यदि ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही दोनों की सगाई भी सम्पन्न करा दिया जायेगा । फिर बाहर झमाझम बरसते पानी में बनते विलीन होते अनगिनत बुलबुले को देख अपने बेसुरे स्वर में ठहाका लगाते हुए गाने लगे- मोरे सईयां भयो कोतवाल अब डर काहे का……।

उनके भयानक ठहाके से दालान का कोना – कोना कांँप उठा।

उधर वारिस के बीच ड्राइविंग सीट पर बैठा भोला न चाहते हुए भी सामने लगे आईने में एस० पी० आनंदी को जब भी देखता उसका रोम रोम एक अनजाने भय से काँप उठता । आँखो के आगे खेत की मेङ पर खून से लथपथ मृत रामपुकार का चेहरा कौध जाता । कानों में वहीं आवाज गुंजने लगती तपेसर बाबू मेरे कत्ल का गवाही भरी आदालत में यही बुलबुला देगा । इस तुफानी बरसात में भी पसीने से तरबतर भोला कब कोठी के आहाते में पहूँचा उसे पता ही न चला। आनंदी विस्फारित आँखों से कोठी की भव्यता को देख रोमांचित हो रही थी । अचानक उसकी नजरक्षआहाते के बीचो-बीच गोलाकार तालाब में जलपरी की मूर्ति पर पङी जो इस तरह लेटी हुई थी मानो वह अपने दोनों हाथों से जल में बनते बिगङते बुलबुले को पकङने की कोशिश कर रही हों । आनंदी से रहा नहीं गया पोर्टिको में बैठी -बैठी जलपरी का विडियों बनाने लगी । पास ही कुर्सी पर बैठे तपेसर बाबू एकटक एस.पी.आनंदी को बहु के रूप कल्पना कर निहारे जा रहे थे, साध ही पैतीस बर्षों से अपने सीने में दबाये कत्ल की भयानक दास्तान को एक कुशल वक्ता की तरह धीरे -धीरे समझा भी रहे थे । फिर आलमारी से एक पुरानी फाईल को देते हुए कहने लगे बेटा कल तो तुम अपनी सरकारी कोठी में रहने चली जाओगी ।इस केस को रफा-दफा कर देना ताकि मैं शेष बचे जीवन को सुकून से बीता सकूं।

रात भर आनंदी रोती हुई फाईल को पलटती रही, जहाँ जहाँ अपने पिता का नाम पढती स्वतः उसकी तर्जनी रूक जाती और आँखों से आँसू के कुछ बूंद टपक पङते । फाईल को यथोचित बंद करते हुए बुदबुदाते हुए बोल उठी बुल्ला की गवाही पूर्ण हुई पापा ।

आज पुरे गाँव में बस एक ही चर्चा जोरों पर थी बुल्ला की गवाही जितनी मुँह उतनी बातें- कोई कहता अरे भाई थाने की दोस्ती कहीँ अच्छी होती है?उससे जितना दूर रहो उतना अच्छा । कहा भी गया है कि थाना लगाबे फान्ना और देखो वही हुआ । इस बुढापे में तपेसर बाबू को जेल जाना पर गया । सूनते है कि आजीवन कारावास की सजा मिलेगी नहीं तो फांसी तो मिलना ही मिलना है । अरे यह कत्ल का केस तपेसर बाबू की जवानी में बहुत दिनों तक चली थी । हुआ यह था कि एक बार लगातार मुसलाधार बर्षा होने के कारण खेतों की फसलें डूब गये थे इनके बगल में एक नाई रामपुकार का खेत था , बेचारा गरीब था ।परिवार के नाम पर पत्नी और एक तीन साल की बेटी मात्र थी । फसल को बचाने के ख्याल से उसी झमाझम बरसते मेघ में बेचारा खेत की मेङ को काट कर पानी निकाल रहा था पानी तपेसर बाबू के खेत से होकर बहने लगा । तपेसर बाबू को पता चला और वे भी अपने डूबते फसल को देखने आ पहुंचे,फिर क्या तपेसर बाबू रामपुकार को बेरहमी से मारना शुरु कर दिया उसके हाथ से कुदाल छीन कर उसके माथे पर दे मारा । माथा फट जाने से उसकी मौत हो गई । बेचारा इतना ही कह पाया की मेरी गवाही यही बुलबुला देगा तपेसर बाबू।

डॉ. नीलिमा वर्मा “निशिता”

कवयित्री, लेखिका एवं संस्कृत विदुषी