(संस्कृत-दिवस)
प्राचीन भारत (ऐतिहासिक काल) की अवधि सामान्यतया 400ई०पू०से सन् 647 ,इस अवधि में दो शिक्षा पद्धतियां विकसित हुई जिनकी उपलब्धियां महान है । ये शिक्षा पद्धतियां थी – ब्राह्मण शिक्षा पद्धति तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति । ब्राह्मण शिक्षा पद्धति आर्य संस्कृति की देन है जिसका प्रथम दर्शन ऋग्वेद में होता है और इसका प्रौढ़ रूप उत्तर वैदिक काल में प्रकट होता है ।
बौद्ध शिक्षा पद्धति बौद्ध धर्म के साथ ई०पू०6वीं सदी में उदित हुई ।बौद्ध धर्म ने बौद्ध संघ का जन्म दिया और यहीं संघ बौद्ध शिक्षा का सांगठनिक आधार बना । 6वीं एवं 7वीं सदी इस्वी में यह शिक्षा पद्धति अपने चर्मोत्कर्ष पर थी । इसके बाद से बौद्ध धर्म का पतन आरम्भ हो गया । 12 वीं सदी के अंत में भारत के सुप्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय नालंदा तथा विक्रमशिला मुस्लिम आक्रमणों द्वारा ध्वसत कर दिये गये । इसके साथ ही बौद्ध शिक्षा पद्धति भी भारत से विलुप्त हो गयी ।
यद्यपि ब्राह्मण शिक्षा का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक था तथापि जीवन की भौतिक तथा सामाजिक स्थितियों की उपेक्षा नहीं थी मनुष्य को संसार में रहना है , उसे अपना भौतिक अस्तित्व कायम रखना है ,उसे अपने जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करनी है, साथ ही उसे सामाजिक सम्बन्धों को भी निभाना है ।अर्थात शिक्षा का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना था । वैदिक काल का विद्यालय (गुरुकुल) आज के स्कूल अथवा कालेज की तरह निर्जीव भवन मात्र न थे, जहाँ शिक्षक और छात्र 5-6 घंटो के लिए एकत्र होते है । ये सजीव समुदाय थे, कुल थे जिसका प्रधान गुरु होता था ।प्राचीन भारत का विद्यालय गुरु का कुल था, गुरु का परिवार था ।इसी परिवार के एक उदीयमान सदस्य के रूप में बालक अपनी शिक्षा ग्रहण करता था ।
गुरुकुल का भौतिक वातावरण में प्रकृति अपनी सारी विभूतियों के साथ बालक के समक्ष सतत् उपस्थित रहती थी और उसे आध्यात्मिक विकास की ओर प्रेरित करती रहती थी । उन्मुक्त आकाश, हरित धरित्री,सुरभीत लतिकाऐ,कलकल निनादिनी सरिता,, बालक को सत्यम्- शिवम्- सुन्दरम् का संदेश प्रतिपल देती रहती थी ।
उपनयन संस्कार (आध्यात्मिक गर्भाधान ) गुरुकुल में प्रवेश पाने के लिए उपनयन संस्कार अनिवार्य था । बालक गुरु के समक्ष हाथ में समिधा (होम की लकङी) लेकर उपस्थित होता था और प्रार्थना करता था कि भगवन मुझे ब्रह्मचारी स्वीकार करें । गुरु उसके वंश के बारे में पूछते थे और संतुष्ट होने के पश्चात वे उस बालक को शिष्य बनाने के लिए तैयार होते थे । गुरु अपना दाया हाथ शिष्य के मस्तक पर रखते थे । इसके साथ ही वे बालक शिष्य तीन दिनों तक गुरु के गर्भ में रहता था ।तीसरी रात्रि को उसका पुनर्जन्म होता था । जन्म के तुरत बाद गुरु शिष्य को सावित्री मंत्र की दीक्षा देते थे जिससे उसकी बुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का विकास हो ।अब वह द्विज अर्थात् दोबारा जन्मा हुआ कहा जाता था । ब्रह्मचारी के सांकेतिक चिन्ह थे कुश की मेखला ,लम्बे-लम्बे केश,दण्ड,बालक के वायें कंधे पर पवित्र तीन धागों बाला जनेयू जो देव ऋण, ऋषि ऋण और पित् ऋण के कर्तव्यों का प्रतीक होता था तथा कमण्डल ।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति,
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत ।
उपाकर्मण श्रावणी —
अर्थात् वैदिक गुरुकुल विद्यालयों का शिक्षण – सत्र । श्रावण मास की पूर्णिमा को प्रारम्भ होता था। इस उत्सव को उपाकर्मण कहा जाता था । कोई-कोई इसे श्रावणी भी कहते थे । वर्तमान में इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है । वैदिक गुरुकुल में इस अवसर पर गुरु तथा शिष्य सभी मिलकर वैदिक देवताओं यथा इन्द्र,वरूण आदि की पूजा करते थे । देवताओ के पूजा के पश्चात मेधा,पूषा,तथा श्रद्धा इन तीन मानसिक शक्तियों की पूजा होती थी ।इन पूजा के बाद भूतपूर्व आचार्यो और संरक्षकों की पूजा की जाती थी।
इस उत्सवों के बाद गुरुकुल का शिक्षण-सत्र नियमित रूप से लगभग पाँच महिनों तक चलता था । अर्थात उपाकर्मण शिक्षण-सत्र का प्रारम्भ दिवस के रूप में प्रचलित था ।
पाँच माह के बाद पौष माह की पूर्णिमा को उपरोक्त सत्र समाप्त हो जाता था । इस अवसर पर भी एक उत्सव मनाया जाता था जिसे छंदसाम उत्सर्जनम् कहा जाता था । इस तरह वैदिक शिक्षण-सत्र केवल पाँच महिनों तक होता था । किन्तु शेष महिनों में छात्रों का स्वाध्याय जारी रहता था ।
समावर्तन संस्कार – (आधुनिक दिक्षांत समारोह)
समावर्तन का शाब्दिक अर्थ घर लौटना, इसे स्नान संस्कार भी कहा गया है । यह संस्कार (आश्रम परिवर्तन) के रूप में देखा जाता है क्योंकि यह संस्कार केवल शिक्षा का नहीं बल्कि किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन में अपनाने और जिम्मेदारियों को संभालने की शुरूआत है , 25 वर्ष पूर्ण होने के उपरान्त यह संस्कार मनाई जाती थी अब ब्रह्मचारी विधार्थी से स्नातक बन जाता था तथा विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने योग्य माना जाता था। इस विशेष आयोजन संस्कार में आठ कलशों में विधि पूर्वक विभिन्न नदियों का शुद्ध जल में विभिन्न औषधियाँ, सुगंधित पदार्थ आदि मिलाया जाता तथा उस जल से शिष्य को विशेष मंत्र के साथ स्नान कराया जाता था, तदुपरान्त ब्रह्मचारी उपनयन संस्कार के सांकेतिक चिन्ह कुश की मेखला, दण्ड, कमण्डल आदि को वह त्याग देता था और अंगराग,,सुगंध,छत्र,जूते माला,पगङी आदि पहनता था अब वह ब्रह्मचारी स्नातक कहलाता था नवीन वेश भूषा धारण करके रथ अथवा हाथी पर बैठकर प्रायः किसी विद्वत् परिषद के सभाओं में जाता था जहाँ गुरु एवं पुरी सभा के सम्मुख प्रायः स्नातक अपनी ज्ञान, प्रतिभाऔर विद्या का परिचय देता था । तदनंतर गुरु के आशिर्वाद के साथ ब्रह्मचारी को स्नातक की उपाधि से विभुषित किया जाता था । स्नातक शब्द कोई संधि युक्त शब्द नहीं बल्कि यह स्नात धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ स्नान किया हुआ होता है जिसमें प्रत्यय जोङने से बना एक मूल शब्द है- ष्णा शौचे धातु (पवित्रता, निर्मलता, सफाई अर्थ वाले क्रिया) से कर्तरि क्त कर्ता अर्थ में क्त प्रत्यय लगाकर स्नात शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है स्नान किया हुआ स्नात शब्द से स्व अर्थ में कन् प्रत्यय लगाकर स्नातक शब्द बनता है ।
समाप्त वेदाध्यने स्नानशीलः अभिषेके अर्थात सिंचन,आप्लावन या स्नान से है । गुरुकुल में विधाध्ययन पूर्ण होने पर यह अभिषेक होता था। जो ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का प्रतीक है । स्नातक की उपाधि तीन श्रेणियों में विभक्त थी—
1 व्रत स्नातक—- यह उपाधि वैसे ब्रह्मचारी को दिया जाता था जो ब्रह्मचर्य व्रत पालन तो किया , किन्तु अपनी विधा का अध्ययन पूर्ण नहीं कर सका ।
2 विद्या स्नातक —- यह उपाधि वैसे ब्रह्मचारी को दिया जाता जो विद्याध्ययन तो पूर्ण कर लिया किन्तु ब्रह्मचर्य व्रत का सम्यक पालन न कर सका ।
3 विद्या व्रत स्नातक—- वैसे ब्रह्मचारी जो कुरुकुल आश्रम के ब्रह्मचर्य व्रत एवं विद्या अध्ययन दोनों में पूर्णता प्राप्त कर लिया हो उसे विधाव्रत स्नातक की उपाधि से विभूषित किया जाता था । यह तीनों स्नातको में श्रेष्ठ उपाधि होता था ।
इस प्रकार गुरुकुल का शिक्षण व्यवस्था उपनयन स़ंस्कार से शुरू होकर समावर्तन संस्कार अर्थात स्नान संस्कार (आधुनिक दीक्षान्त समारोह) उपरांत गुरु उपदेश के साथ समाप्त होता था ।
