संस्कृत एवं संस्कृति

भौतिकी के जनक महर्षि कणाद द्वारा प्रतिपादित गति के तीन नियम

बीज और कणों पर विचार करते प्राचीन दार्शनिक का प्रतीकात्मक चित्र।
भौतिकी के जनक महर्षि कणाद द्वारा प्रतिपादित गति के तीन नियम से प्रेरित एआई चित्रांकन।
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वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धांत के प्रवर्तक महर्षि कणाद का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व गुजरात के प्रभास पाटल (प्रकाशमय भूमि) वेरावल में हुआ जो आज प्रसिद्ध धार्मिक स्थल सोमनाथ मंदिर के लिए जाना जाता है।

वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धांत के प्रवर्तक महर्षि कणाद आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्वं सर्वप्रथम ब्रह्ममाण्ड का विश्लेषण परमाणु विज्ञान की दृष्टि से सूत्रबद्ध शास्त्र के रूप में अपने वैशेषिक दर्शन में प्रतिपादित किया था। फलतः महर्षि कणाद वैशेषिक सूत्र के निर्माता ,परम्परा से प्रचलित वैशेषिक सिद्धांतों के क्रमबद्ध संग्रह कर्ता एवं वैशैषिक दर्शन के उद्धार कर्ता माने जाते है । महर्षि कणाद की गिनती संसार के सबसे प्राचीन वैज्ञानिक एवं चिंतकों में होती है क्योंकि वैशेषिक दर्शन भारतीय दर्शनों में एक महत्वपूर्ण दर्शन है। यह दर्शन न्याय दर्शनों से बहुत साम्य रखता है किन्तु वास्तव में यह एक स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन है । इस प्रकार के आत्म दर्शन के विचारों को सबसे पहले महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में लिखा । कणाद उच्छवृति थे और धान्य के कणों का संग्रह कर उसी को खाकर तपस्या करते थे ।उनके अनुसार किसी झरोखे से आती हुई रोशनी में उङते हुए कण का 16 वां भाग परमाणु होता है ।

कण अर्थात प्रमाणु तत्व का सूक्ष्म विचार सर्व प्रथम इन्होंनें ही किया था । इसलिये इन्हें कणाद, कणभुक् के साथ- साथ ये दिनभर समाधि रत रहते और रात्रि में कणों का संग्रह करते ,उनकी यह वृत्ति उल्लू पक्षी वृति के साम्य थी अतः इनकी इस कठीन तपस्या से प्रसन्न हो ईश्वर ने उलूक पक्षी के रूप में प्रकट हो इन्हें शास्त्र का उपदेश दिया। इन्हीं कारणों से इनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन आलुक्य, कणाद,वैशैषिक,एवं पशुपत दर्शन के नाम से प्रसिद्ध है । वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद गति के तीन नियमों को सूत्रबद्ध किया है गति का पहला नियम—-

(1) वेगः निमित्त विशेषात कर्मणो जायते

अर्थात गति में परिवर्तन प्रभावित बल के कारण होता है।

(2) वेगः निमित्तापेक्षात कर्मणो जायते नियतादिक क्रिया प्रबंध हेतु

अर्थात दूसरे नियम के अनुसार गति में परिवर्तन प्रभावित बल के समानुपाती होता है और बल की दिशा में होता है ।

(3) वेगःसंयोग विशेष विरोधी ।

महर्षि कणाद द्वारा गति के तीसरे नियम के अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया समान परन्तु विपरित होती है ।

इस प्रकार छठी शताब्दी ईसा पूर्व महर्षि कणाद प्रमाणु सिद्धांत और भौतिकी के जनक, भारतीय ऋषि और दार्शनिक अणु की अवधारणा (प्रमाणु )को विकसित करने बाले , महर्षि कणाद की पदार्थ और प्रकृति के प्रति उनकी अंतर्दृष्टि, ब्रह्मांड के मूलभुत घटकों को समझने में योगदान दिया जो आज भी सतत भोतिकी physics को समझने हेतु एक मजबूत स्तंभ स्वरूप है । प्राचीन महर्षि,प्रमाणु अविष्कारक वैज्ञानिक कणाद की महानता , निःस्वार्थता वंदनीय एवं अनुकरणीय है 🙏जय भारत जय भारती🙏

डॉ. नीलिमा वर्मा “निशिता”

कवयित्री, लेखिका एवं संस्कृत विदुषी