हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है । यह बङे ही आश्चर्य की बात हैं कि "हिन्दी" शब्द न संस्कृत का है और न हिन्दी का । हिन्दी शब्द फारसी का है जिसका अर्थ हिन्दी में बोली जाने वाली भाषा के रूप में प्रयुक्त हुआ है।।
कई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में आर्य आए और अपनी संस्कृति लाए। हालांकि इसमें भी अभी मतभेद है कि आर्य भारत के मूल निवासी है या बाहर से आए। फिर भी न केवल ईरानी बल्कि दुनिया भर के कई महादेशों और जातियों के लोग अपने को आर्य कहते हैं । ईरानियों की भाषा ईरानी है और उसका प्रमुख ग्रंथ अवेस्ता तथा हम भारतीय आर्यों के प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद है दोनो ग्रंथों में बहुत सी समानताएँ है । सिन्धु ऋग्वेद कालीन आर्यों की प्रमुख नदी है । ईरानी लोग "स" का उच्चारण"ह" के अनुसार करते थे ।अतः सिन्ध शब्द ईरानी ध्वनि में हिन्द बन गया और हिन्द में रहने वाले की भाषा पहले हिन्दुई-फिर-हिन्दवी-फिर हिन्दी बन गई ।
विश्व की आर्थिक मंच के गणना अनुसार हिन्दी विश्व की दश शक्तिशाली भाषाओं में एक है । जहाँ तक इसके शब्द भण्डारण की बात है तो अभी तक एक सौ दो अरब, अट्ठत्तर करोड़, पच्चास लाख शब्दों का प्रयोग हुआ है और यदि इसी क्रम से नये शब्दों का प्रयोग होता रहे तो मान्यता है कि सौ से दो सौ बर्षों तक इसका शब्द भण्डार खाली नहीं होगा।
अब मेरा यह प्रश्न है कि आखिर मानक हिन्दी की आवश्यकता क्यों पङी? जबाव सीधी है कि हिन्दी जनपदीय संदर्भ में बिहार,उत्तर – प्रदेश, हरियाणा, झारखंड,हिमाचल-प्रदेश,
राजस्थान,मध्यप्रदेश,दिल्ली,उत्तराखंड,छत्तीसगढ़ आदि प्रदेशों की राजभाषा है तथा वहाँ के नागरिकों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में प्रथम है ,तो वहीं कुछ क्षेत्रों में हिन्दी द्वितीय मातृभापा है तथा भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मागधी,बज्जिका आदि प्रथम मातृभाषा के रूप में प्रयोग होती है ।फलतःइन क्षेत्रों के नागरिक जब हिन्दी बोलते या लिखते है तो शब्दों या वाक्यों में क्षेत्रीय भाषा,सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक, सास्कृतिक शक्तियों के दबाव एवं प्रभाव के कारण शब्दो,वाक्यों का अमानक प्रयोग, उच्चारण की मनमानी न चाहते हुए भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है ।
डा० रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने मानक भाषा को आधुनिकी
करण से जोङकर भाषा का वैधानीकरण कहा है । व्याकरण हमारे प्रयोग की कसौटी है। अग्नि और आत्मा शब्द संस्कृत से आये है संस्कृत में यह शब्द पुल्लिंग किन्तु हिन्दी में इसे स्त्रीलिंग माना गया है, अरबी में कलम पुल्लिंग है किन्तु हिन्दी में इसे स्त्रीलिंग रूप में प्रयोग करते है । बोलने वालों के बीच व्यवधान , उच्चारण की असुविधा होने के कारण भाषा केचछं सभीचं अंग घिसते,टूटते,विकृत तथा पुनर्निमित हो ध्वनियों तथा शब्दों के रूप बदल जाते है ।
शिक्षा मंत्रालय ने 1967 में हिन्दी वर्तनि का मानकीकरण तथा 1983 में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण पुस्तक प्रकाशित कर हिन्दी वर्तनि में एकरूपता लाने का अद्यतन नियमों का प्रतिपादन किया है ।
आइए कुछ अशुद्ध और मानक शब्दों को देखें—–
अशुद्ध शब्द—मानक शब्द
अहिल्या——-अहल्या
अनेकों ———–अनेक,
आध्यात्म——–अध्यात्म,
आश्चर्य-चकित—आश्चर्यित,
कैलाश———कैलास
अत्योक्ति—–अत्युक्ति,
अनिष्ठ——-अनिष्ट,
केन्द्रीयकरण—-केन्द्रीकरण
ग्रसित—-ग्रस्त
द्वारिका—-द्वारका,
भलीभाँति—–भली भाँति
( विशेष्य और विशेषण) को मिलाकर लिखना अमानक है ।
क्रमशः——🙏
